बागेश्वर में ट्राउट मत्स्य पालन के जरिए ग्रामीण युवाओं को मिल रहा स्वरोजगार और बेहतर आय का अवसर।
बागेश्वर। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में प्राकृतिक संसाधन अब युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार का मजबूत आधार बनते जा रहे हैं। बागेश्वर जिले में ट्राउट मत्स्य पालन इसका एक बेहतरीन उदाहरण बनकर सामने आया है। ठंडे पानी के प्राकृतिक स्रोतों का उपयोग करते हुए जिले के कई ग्रामीण युवा और मत्स्य पालक ट्राउट उत्पादन से अपनी आय बढ़ा रहे हैं।

मत्स्य विभाग की योजनाओं, तकनीकी मार्गदर्शन और सरकारी सहायता से ट्राउट पालन को गांवों में रोजगार के नए विकल्प के तौर पर विकसित किया जा रहा है। इसका असर केवल मत्स्य पालकों की आमदनी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए स्थानीय स्तर पर दूसरे लोगों को भी काम मिल रहा है। इस तरह ट्राउट पालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था, स्वरोजगार और रिवर्स पलायन को बढ़ावा देने वाला माध्यम बनता दिखाई दे रहा है।
होटल की नौकरी छोड़ी, गांव लौटकर शुरू किया ट्राउट का कारोबार

विकासखंड बागेश्वर के ग्राम सानिउडियार निवासी चन्द्रशेखर की कहानी पहाड़ लौटकर स्वरोजगार शुरू करने वाले युवाओं के लिए प्रेरणा है। उन्होंने वर्ष 2016 में होटल मैनेजमेंट का कोर्स किया और इसके बाद दिल्ली के एक होटल में कुक के तौर पर नौकरी शुरू की।
कुछ वर्षों तक होटल में काम करने के बाद उन्होंने वर्ष 2019 में नौकरी छोड़कर गांव लौटने का फैसला किया। गांव वापस आने के बाद उन्होंने मत्स्य पालन को अपना स्वरोजगार बनाया।
शुरुआत में यह काम उनके लिए नया था, लेकिन विभागीय सहयोग और तकनीकी जानकारी के जरिए उन्होंने ट्राउट मत्स्य पालन को धीरे-धीरे व्यवस्थित रूप दिया। इसके बाद उन्होंने ट्राउट मछली से तैयार होने वाले व्यंजनों को ग्राहकों तक पहुंचाने की दिशा में भी काम किया।
मोबाइल फिश वैन ने बढ़ाया कारोबार
चन्द्रशेखर के काम को वर्ष 2021-22 में उस समय नई गति मिली, जब उन्हें विभाग की ओर से मोबाइल फिश वैन उपलब्ध कराई गई। इसके माध्यम से उन्होंने ट्राउट से तैयार खाद्य पदार्थों और व्यंजनों की बिक्री शुरू की।
यानी उन्होंने केवल मछली उत्पादन तक अपने काम को सीमित नहीं रखा, बल्कि ट्राउट को तैयार खाद्य उत्पाद के रूप में बाजार तक पहुंचाने का मॉडल भी विकसित किया।
आज उनकी मेहनत का परिणाम यह है कि उन्हें करीब 55 से 60 हजार रुपये प्रतिमाह की आय हो रही है। इतना ही नहीं, उनके इस काम से दो अन्य लोगों को भी रोजगार मिला है।
चन्द्रशेखर का मॉडल बताता है कि पहाड़ में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों और सरकारी योजनाओं को सही तरीके से जोड़कर रोजगार का टिकाऊ विकल्प तैयार किया जा सकता है।
10 साल से ट्राउट उत्पादन में जुटे चन्दन सिंह
कपकोट विकासखंड के ग्राम जगथाना निवासी चन्दन सिंह ने भी ट्राउट मत्स्य पालन को अपनी आजीविका का मजबूत आधार बनाया है। वह पिछले करीब 10 वर्षों से ट्राउट उत्पादन के क्षेत्र में काम कर रहे हैं।
लंबे अनुभव और बेहतर प्रबंधन के चलते वर्तमान में वह हर वर्ष लगभग 35 कुंतल ट्राउट का उत्पादन कर रहे हैं। उनका काम केवल उनकी अपनी आय तक सीमित नहीं है। उनके माध्यम से करीब 30 लोगों को रोजगार से जोड़ा गया है।
यह आंकड़ा बताता है कि ट्राउट पालन यदि व्यवस्थित तरीके से किया जाए तो यह एक व्यक्ति के लिए स्वरोजगार के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन का भी माध्यम बन सकता है।
ITBP और SSB से लेकर होटल-रेस्टोरेंट तक मांग
चन्दन सिंह द्वारा उत्पादित ट्राउट की मांग जिले से बाहर भी बनी हुई है। उनके उत्पाद को आईटीबीपी, एसएसबी के साथ-साथ विभिन्न होटल और रेस्टोरेंट में भी बाजार मिल रहा है।
स्थानीय उत्पादन को इस तरह संस्थागत और व्यावसायिक बाजार मिलने से मत्स्य पालकों को अपने उत्पाद की बिक्री के लिए बड़े बाजारों तक पहुंच बनाने में मदद मिल रही है।
ट्राउट की बढ़ती मांग ने बागेश्वर में इस व्यवसाय की संभावनाओं को और मजबूत किया है।
लीती गांव की सहकारी समिति ने भी दिखाया सामूहिक मॉडल
बागेश्वर में ट्राउट पालन की तस्वीर केवल व्यक्तिगत उद्यमियों तक सीमित नहीं है। ग्राम लीती में गठित प्राथमिक मत्स्य जीव सहकारी समिति के माध्यम से भी ग्रामीण सामूहिक रूप से मत्स्य पालन कर रहे हैं।
इस समिति में 15 सदस्य सक्रिय रूप से ट्राउट मत्स्य पालन से जुड़े हुए हैं। सामूहिक प्रयास के तहत प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के माध्यम से समिति के लिए 10 रेसवे तैयार किए गए हैं।
रेसवे आधारित प्रणाली ने समिति के सदस्यों को ट्राउट उत्पादन के लिए जरूरी आधारभूत ढांचा उपलब्ध कराया है।
मार्च 2026 तक 16 कुंतल ट्राउट उत्पादन
लीती की प्राथमिक मत्स्य जीव सहकारी समिति ने भी अपने प्रयासों से अच्छी उपलब्धि हासिल की है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक समिति ने मार्च 2026 तक करीब 16 कुंतल ट्राउट का उत्पादन किया।
इस उत्पादन से समिति को लगभग 8 लाख रुपये की आय प्राप्त हुई। सामूहिक स्तर पर हासिल यह आमदनी ग्रामीणों के लिए मत्स्य पालन की आर्थिक संभावनाओं को दर्शाती है।
अगर इस मॉडल को और विस्तार दिया जाता है तो आने वाले समय में अधिक ग्रामीण परिवारों को इससे जोड़कर स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
पहाड़ के पानी से रोजगार की राह
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में ठंडे पानी के स्रोतों की उपलब्धता ट्राउट पालन के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती है। ऐसे प्राकृतिक संसाधनों का वैज्ञानिक और योजनाबद्ध तरीके से इस्तेमाल करके ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।
बागेश्वर में सामने आए ये उदाहरण दिखाते हैं कि प्राकृतिक संसाधन केवल पर्यावरणीय संपदा नहीं हैं, बल्कि इनके संरक्षण के साथ-साथ इनका जिम्मेदारीपूर्ण उपयोग आजीविका और स्वरोजगार का साधन भी बन सकता है।
युवाओं के लिए गांव में ही रोजगार का विकल्प
रोजगार की तलाश में पहाड़ से शहरों की ओर होने वाला पलायन उत्तराखंड की बड़ी चुनौतियों में रहा है। ऐसे में चन्द्रशेखर जैसे युवाओं का नौकरी छोड़कर गांव लौटना और स्थानीय संसाधनों पर आधारित स्वरोजगार शुरू करना महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है।
ट्राउट पालन जैसे व्यवसाय युवाओं को यह विकल्प देते हैं कि वे अपनी जमीन और गांव से जुड़े रहकर आय अर्जित कर सकते हैं। वहीं चन्दन सिंह का उदाहरण यह दिखाता है कि स्वरोजगार आगे चलकर दूसरों के लिए भी रोजगार पैदा कर सकता है।
सरकारी योजनाओं और तकनीकी सहयोग से मिल रहा बढ़ावा
ट्राउट मत्स्य पालन को आगे बढ़ाने में सरकारी योजनाओं और विभागीय तकनीकी सहयोग की महत्वपूर्ण भूमिका है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना सहित विभिन्न योजनाओं के माध्यम से आधारभूत ढांचे को विकसित करने और ग्रामीणों को मत्स्य पालन से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं।
बागेश्वर में रेसवे निर्माण, मोबाइल फिश वैन और तकनीकी सहयोग जैसे प्रयासों ने इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को उत्पादन के साथ-साथ बाजार तक पहुंच बनाने में भी मदद दी है।
रिवर्स पलायन और आत्मनिर्भरता की दिख रही तस्वीर
बागेश्वर में ट्राउट पालन की बढ़ती गतिविधियां यह संकेत दे रही हैं कि पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानीय संसाधनों पर आधारित रोजगार को बढ़ावा देकर युवाओं को गांव से जोड़ा जा सकता है।
चन्द्रशेखर ने दिल्ली की नौकरी छोड़कर गांव में नया रास्ता चुना, जबकि चन्दन सिंह ने लंबे समय तक ट्राउट उत्पादन करके अपने साथ कई लोगों को रोजगार दिया। दूसरी ओर लीती की सहकारी समिति ने सामूहिक भागीदारी के जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का उदाहरण प्रस्तुत किया है।
इन प्रयासों से यह साफ है कि यदि पहाड़ में उपलब्ध संसाधनों का वैज्ञानिक तरीके से इस्तेमाल हो और बाजार से बेहतर कनेक्शन मिले, तो मत्स्य पालन ग्रामीण आत्मनिर्भरता और रिवर्स पलायन का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
बागेश्वर से निकली उम्मीद की नई लहर
ट्राउट पालन ने बागेश्वर के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की एक नई संभावना को मजबूत किया है। कहीं युवा नौकरी छोड़कर गांव लौट रहे हैं, कहीं किसान उत्पादन बढ़ाकर दर्जनों लोगों को रोजगार दे रहे हैं और कहीं ग्रामीण सहकारी समिति के माध्यम से सामूहिक रूप से आय अर्जित कर रहे हैं।
सरकारी योजनाओं, तकनीकी सहायता, प्राकृतिक संसाधनों और बाजार की मांग का यह मेल आने वाले समय में बागेश्वर को ट्राउट मत्स्य पालन के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।
