चम्पावत के बाराकोट क्षेत्र में आधुनिक कृषि तकनीकों के जरिए खेती को आत्मनिर्भरता का आधार बना रहे युवा किसान विनोद सिंह।
चम्पावत। उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में खेती को अक्सर कठिन मेहनत और सीमित आमदनी से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन चम्पावत जिले के बाराकोट विकासखंड के ग्राम च्यूरानी निवासी युवा किसान विनोद सिंह ने इस सोच को बदलने की दिशा में एक प्रेरक उदाहरण पेश किया है। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद नौकरी की तलाश में भटकने के बजाय विनोद सिंह ने अपनी पैतृक जमीन को ही अपनी आजीविका का आधार बनाया और आधुनिक तकनीक के सहारे खेती को एक व्यवस्थित व्यवसाय का रूप दिया।

विनोद सिंह ने करीब 40 नाली कृषि भूमि पर संरक्षित खेती और खुले खेतों को मिलाकर एकीकृत कृषि मॉडल तैयार किया है। उनके खेत में पॉलीहाउस, सिंचाई के लिए जल संचयन टैंक और जैविक खाद तैयार करने के लिए वर्मीकम्पोस्ट इकाई मौजूद है। यही वजह है कि उनका कृषि प्रक्षेत्र अब सिर्फ उत्पादन का केंद्र नहीं, बल्कि आसपास के किसानों और युवाओं के लिए सीखने की जगह भी बनता जा रहा है।
एमए और आपदा प्रबंधन में डिप्लोमा के बाद खेती को बनाया रोजगार

विनोद सिंह की शैक्षिक पृष्ठभूमि भी उन्हें दूसरे किसानों से अलग बनाती है। उन्होंने एमए की पढ़ाई करने के साथ ही आपदा प्रबंधन में डिप्लोमा हासिल किया है। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने अपनी पैतृक भूमि को खाली छोड़ने या केवल पारंपरिक खेती तक सीमित रखने के बजाय इसमें आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करने का फैसला किया।
उद्यान विभाग के तकनीकी सहयोग और विभागीय योजनाओं का लाभ लेते हुए उन्होंने अपने खेत को चरणबद्ध तरीके से विकसित किया। आधुनिक उद्यानिकी तकनीकों को अपनाकर उन्होंने यह साबित किया कि पहाड़ों में उपलब्ध सीमित भूमि का बेहतर प्रबंधन किया जाए तो खेती से अच्छी आय और रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
पॉलीहाउस में मौसम की चुनौती का निकाला समाधान
पर्वतीय क्षेत्रों में खेती के सामने मौसम एक बड़ी चुनौती रहता है। बारिश, ठंड, तापमान में बदलाव और अन्य मौसमी परिस्थितियों का सीधा असर फसलों पर पड़ता है। विनोद सिंह ने इस चुनौती से निपटने के लिए अपने कृषि प्रक्षेत्र में अत्याधुनिक पॉलीहाउस स्थापित किया है।
पॉलीहाउस में नियंत्रित वातावरण का लाभ लेते हुए वे प्रतिकूल मौसम के दौरान भी सब्जियों की पौध और बेमौसमी फसलों का उत्पादन कर रहे हैं। इससे फसल उत्पादन का समय बढ़ाने और मौसम पर निर्भरता कम करने में मदद मिल रही है।
खुले खेत में कई सब्जियों की खेती
पॉलीहाउस के साथ-साथ विनोद सिंह खुले खेतों और पहाड़ी ढलानों का भी बेहतर इस्तेमाल कर रहे हैं। उनके खेत में बंद गोभी, फूल गोभी, मूली, फ्रासबीन, कद्दू, लौकी और ककड़ी जैसी विभिन्न सब्जियों का उत्पादन किया जा रहा है।
एक ही तरह की फसल पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग सब्जियों की खेती करने से उनके कृषि मॉडल में विविधता आई है। इससे मौसम या बाजार में किसी एक फसल को नुकसान होने की स्थिति में दूसरी फसलों से आय का विकल्प भी बना रहता है।
आम, अमरूद और अनार का फलोद्यान भी तैयार
सब्जियों के अलावा विनोद सिंह ने अपनी भूमि पर आम, अमरूद और अनार का फलोद्यान भी विकसित किया है। इस तरह उन्होंने सब्जी उत्पादन के साथ फल उत्पादन को भी अपने कृषि मॉडल का हिस्सा बनाया है।
फलोद्यान तैयार करने का उद्देश्य लंबे समय में कृषि भूमि से लगातार उत्पादन हासिल करना है। सब्जियों के साथ फलदार पौधों को शामिल करके उन्होंने अपनी जमीन के अलग-अलग हिस्सों का उपयोग अधिक प्रभावी ढंग से किया है।
2025-26 में दर्ज की उल्लेखनीय पैदावार
वर्ष 2025-26 के दौरान विनोद सिंह ने व्यवस्थित कृषि प्रबंधन के जरिए विभिन्न फसलों से अच्छी पैदावार हासिल की। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उन्होंने इस अवधि में करीब 12 क्विंटल बंद गोभी, 10 क्विंटल शिमला मिर्च, 10 क्विंटल आम, 10 क्विंटल अमरूद और 7 क्विंटल मूली का उत्पादन किया।
इन आंकड़ों से साफ है कि पहाड़ी क्षेत्र में सीमित संसाधनों के बावजूद वैज्ञानिक तरीके और बेहतर प्रबंधन के जरिए कृषि उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है।
रासायनिक खाद से दूरी, वर्मीकम्पोस्ट पर जोर
विनोद सिंह के कृषि मॉडल की एक खास बात उनका जैविक पोषण पर जोर है। उन्होंने रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करते हुए अपने खेत में ही वर्मीकम्पोस्ट तैयार करने की व्यवस्था विकसित की है।
वर्मीकम्पोस्ट के इस्तेमाल से उन्हें जैविक पोषण उपलब्ध होने के साथ खेती की लागत को नियंत्रित करने में भी मदद मिलती है। इसके साथ ही मिट्टी की गुणवत्ता और उर्वरता को बनाए रखने की दिशा में भी यह तरीका उपयोगी है।
जल संरक्षण को भी बनाया खेती का हिस्सा
पर्वतीय खेती में पानी की उपलब्धता और उसका सही इस्तेमाल बेहद महत्वपूर्ण है। विनोद सिंह ने इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए अपने कृषि प्रक्षेत्र में सिंचाई टैंक और जल संचयन की व्यवस्था विकसित की है।
जल संरक्षण और सिंचाई की बेहतर व्यवस्था के कारण फसलों को जरूरत के अनुसार पानी उपलब्ध कराया जा सकता है। यह व्यवस्था खास तौर पर उन क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है जहां सिंचाई के पारंपरिक साधन सीमित हैं।
आसपास के किसानों के लिए बना ‘जीवंत पाठशाला’
विनोद सिंह का खेत अब केवल उनके परिवार की आजीविका का साधन नहीं रह गया है। आधुनिक तकनीक और अलग-अलग कृषि गतिविधियों के कारण आसपास के ग्रामीण काश्तकार और युवा भी उनके कृषि प्रक्षेत्र को देखने और खेती की नई तकनीक समझने पहुंच रहे हैं।
यहां किसान पॉलीहाउस प्रबंधन, जल संचयन, वर्मीकम्पोस्ट तैयार करने और जैविक बागवानी जैसी गतिविधियों को करीब से समझ सकते हैं। इस तरह उनका खेत स्थानीय स्तर पर एक तरह की व्यावहारिक प्रशिक्षणशाला की भूमिका निभा रहा है।
पहाड़ के युवाओं के लिए बड़ा संदेश
विनोद सिंह की कहानी उन युवाओं के लिए महत्वपूर्ण संदेश देती है जो रोजगार की तलाश में लगातार शहरों की ओर जाने को ही एकमात्र विकल्प मानते हैं। उनका उदाहरण बताता है कि यदि स्थानीय संसाधनों, आधुनिक तकनीक और सरकारी योजनाओं का सही इस्तेमाल किया जाए तो गांव में रहकर भी रोजगार और आय के नए अवसर तैयार किए जा सकते हैं।
विशेष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों में छोटी-छोटी कृषि जोतों को वैज्ञानिक तरीके से विकसित करके सब्जी, फल, संरक्षित खेती और जैविक उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सकता है।
सरकार की योजनाओं से मिल रहा आधुनिक खेती को प्रोत्साहन
राज्य सरकार की ओर से पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि और उद्यानिकी को बढ़ावा देने के लिए आधुनिक तकनीक, संरक्षित खेती और स्वरोजगार आधारित गतिविधियों पर जोर दिया जा रहा है। विभागीय तकनीकी सहयोग और योजनाओं के माध्यम से किसानों को आधुनिक कृषि पद्धतियों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
चम्पावत के विनोद सिंह का कृषि मॉडल इसी दिशा में एक जमीनी उदाहरण के रूप में सामने आया है। उन्होंने अपनी पैतृक भूमि को बोझ मानने के बजाय उसे अवसर में बदला और आधुनिक खेती को अपनी आर्थिक आत्मनिर्भरता का आधार बनाया।
खेती से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता पहाड़
विनोद सिंह की पहल यह दिखाती है कि उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में खेती को यदि पारंपरिक तरीके से आगे बढ़ाकर वैज्ञानिक, आधुनिक और बाजार आधारित कृषि मॉडल से जोड़ा जाए तो यह युवाओं के लिए रोजगार का मजबूत माध्यम बन सकती है।
पॉलीहाउस से लेकर वर्मीकम्पोस्ट, जल संचयन से लेकर फलोद्यान और खुले खेतों में विविध सब्जियों के उत्पादन तक विनोद सिंह ने अपनी 40 नाली भूमि का जिस तरह उपयोग किया है, वह दूसरे किसानों और युवाओं के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।
उत्तराखंड में पर्वतीय कृषि को आत्मनिर्भरता, स्वरोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बनाने की दिशा में ऐसे स्थानीय मॉडल आने वाले समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
