चम्पावत के देवीधुरा में रक्षाबंधन पर आयोजित ऐतिहासिक बग्वाल मेले में फलों और फूलों से बग्वाल खेलते बग्वाली तथा आयोजन का अवलोकन करते मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी।
चम्पावत। उत्तराखंड के चम्पावत जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां वाराही धाम देवीधुरा शुक्रवार को आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति के अद्भुत संगम का गवाह बना। रक्षाबंधन के पावन अवसर पर यहां ऐतिहासिक बग्वाल मेले का आयोजन हुआ। चार खाम और सात थोक के बीच होने वाली सदियों पुरानी बग्वाल देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु देवीधुरा पहुंचे।

इस बार बग्वाल दोपहर 1 बजकर 48 मिनट पर शुरू हुई और 1 बजकर 55 मिनट पर समाप्त हुई। यानी करीब 8 मिनट तक बग्वाल मैदान में फल और फूलों की बरसात होती रही। मां वाराही के जयकारों और शंखनाद के बीच पारंपरिक बग्वाल का रोमांच देखने को मिला।
खास बात यह रही कि इस वर्ष बग्वाल में फलों और फूलों का प्रयोग किया गया। इससे सदियों पुरानी परंपरा को सुरक्षित रखते हुए धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप को भी कायम रखा गया।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मां वाराही के किए दर्शन
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी ऐतिहासिक बग्वाल मेले में शामिल हुए। वह हेलीकॉप्टर से देवीधुरा हेलीपैड पहुंचे, जहां जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने उनका स्वागत किया। मुख्यमंत्री के स्वागत में स्थानीय कलाकारों ने पारंपरिक छोलिया नृत्य की प्रस्तुति दी।
मुख्यमंत्री ने शक्तिपीठ मां वाराही देवी की विधिवत पूजा-अर्चना की और प्रदेशवासियों की सुख-समृद्धि, खुशहाली और शांति की कामना की। उन्होंने प्रदेशवासियों को रक्षाबंधन की शुभकामनाएं भी दीं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि देवीधुरा की बग्वाल उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति, आस्था और सामुदायिक सहभागिता का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने कहा कि इस तरह की ऐतिहासिक परंपराएं उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान हैं और इनके संरक्षण के लिए सरकार लगातार काम कर रही है।
चार खाम और सात थोक के बीच हुई ऐतिहासिक बग्वाल
देवीधुरा की बग्वाल की सबसे बड़ी विशेषता चार खामों की पारंपरिक भागीदारी है। बग्वाल में वालिक, चम्याल, गहड़वाल और लमगड़िया खाम के बग्वाली शामिल हुए।
बग्वाली पारंपरिक वेशभूषा और अलग-अलग रंगों की पगड़ियों में मैदान में पहुंचे। उनके हाथों में बांस और रिंगाल से बनी पारंपरिक ढालें थीं। शंखनाद और मां वाराही के जयकारों के साथ बग्वाल की शुरुआत हुई।
इसके बाद मैदान में फल और फूलों की बरसात शुरू हो गई। कुछ ही देर में पूरा बग्वाल मैदान मां वाराही के जयकारों से गूंज उठा।
इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंचे। धार्मिक आस्था के साथ-साथ बग्वाल स्थानीय लोक संस्कृति और सामाजिक एकजुटता की भी पहचान बन चुकी है।
इस बार पाषाण युद्ध में फल-फूलों का प्रयोग
देवीधुरा की बग्वाल को ऐतिहासिक पाषाण युद्ध के रूप में जाना जाता है। हालांकि समय के साथ इसमें कई बदलाव आए हैं और परंपरा को सुरक्षित रखने के लिए अब फल एवं फूलों का प्रयोग किया जाता है।
पीठाचार्य पंडित कीर्तिबल्लभ जोशी के अनुसार, फल-फूलों से खेली जाने वाली बग्वाल को शुभ और फलदायी माना जाता है। उन्होंने ही खामों के आगमन और बग्वाल के संचालन की जिम्मेदारी निभाई।
मुख्यमंत्री धामी ने भी इस परंपरा को अनूठी सांस्कृतिक विरासत बताया। उन्होंने कहा कि देवीधुरा की बग्वाल में परंपरा के साथ अनुशासन और भाईचारे का संदेश भी दिखाई देता है। बग्वाल समाप्त होने के बाद प्रतिभागी एक-दूसरे से गले मिलते हैं।
देवीधुरा को नगर पंचायत बनाने की घोषणा
बग्वाल मेले के दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देवीधुरा को लेकर कई महत्वपूर्ण घोषणाएं भी कीं। उन्होंने देवीधुरा को नगर पंचायत क्षेत्र बनाने की बात कही।
इसके साथ ही उन्होंने देवीधुरा में 9.80 करोड़ रुपये की लागत से मल्टी लेवल पार्किंग का निर्माण जल्द कराने की बात कही। माना जा रहा है कि इससे बग्वाल मेले और अन्य धार्मिक आयोजनों के दौरान आने वाले श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को पार्किंग की समस्या से राहत मिलेगी।
मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि बग्वाल मेले को राजकीय मेला घोषित किया जा चुका है। इससे मेले की व्यवस्थाओं को और बेहतर करने तथा इसकी गरिमा को बढ़ाने में मदद मिलेगी।
मानसखंड मंदिर माला मिशन से धार्मिक स्थलों का विकास
मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखंड सरकार धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने पर विशेष जोर दे रही है। इसी क्रम में मानसखंड मंदिर माला मिशन के तहत कुमाऊं क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक और पौराणिक स्थलों का विकास किया जा रहा है।
देवीधुरा मंदिर परिसर में 4.27 करोड़ रुपये की लागत से गढ़वाल खाम भवन और 4.57 करोड़ रुपये की लागत से रणकोची मंदिर के पुनर्निर्माण का काम चल रहा है।
इसके अलावा घटोत्कच मंदिर के सौंदर्यीकरण, घटकु हिडिंबा मंदिर निर्माण, सप्तेश्वर महादेव मंदिर में स्नानघाट और लधौनधुरा मेला स्थल के सौंदर्यीकरण जैसे कार्य पूरे किए जा चुके हैं।
धार्मिक पर्यटन के साथ स्थानीय रोजगार पर जोर
मुख्यमंत्री ने कहा कि धार्मिक पर्यटन का उद्देश्य केवल श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना भी है। धार्मिक स्थलों के विकास से स्थानीय युवाओं, व्यापारियों, होमस्टे संचालकों और स्वरोजगार से जुड़े लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में विकास और विरासत दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ने की जरूरत है। सरकार का प्रयास है कि आधुनिक सुविधाओं के विस्तार के साथ प्रदेश की लोक परंपराएं और ऐतिहासिक धरोहरें भी सुरक्षित रहें।
68.58 करोड़ रुपये से हुए 397 विकास कार्य
मुख्यमंत्री के अनुसार पिछले पांच वर्षों में धार्मिक अवस्थापना और सौंदर्यीकरण से जुड़े 397 कार्यों पर 68.58 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं।
देवीधुरा क्षेत्र में भी कई विकास योजनाओं पर काम किया जा रहा है। घटोत्कच से झालिमाली मंदिर मार्ग के डामरीकरण के लिए 1.95 करोड़ रुपये की परियोजना पर काम किया जा रहा है।
विभिन्न मंदिरों के सौंदर्यीकरण के लिए 4.70 करोड़ रुपये तथा पूर्णागिरि मार्ग पर 5 करोड़ रुपये की स्ट्रीट लाइट परियोजना के कार्य भी किए जा रहे हैं।
इसके अलावा पाताल रुद्रेश्वर, खेतीखान सूर्य मंदिर, भूमिया देव मंदिर, भिगराड़ा मंदिर और डुंगरी-फत्याल शिव मंदिर से जुड़े विकास कार्य भी आगे बढ़ाए जा रहे हैं।
रक्षाबंधन पर मुख्यमंत्री को महिलाओं और बच्चियों ने बांधी राखी
बग्वाल मेले के दौरान रक्षाबंधन पर्व की भी विशेष झलक देखने को मिली। मेले में मौजूद बच्चियों और महिलाओं ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को राखी बांधी।
मुख्यमंत्री ने सभी को रक्षाबंधन की शुभकामनाएं दीं और कहा कि मां वाराही की कृपा सभी प्रदेशवासियों पर बनी रहे।
बग्वाल सिर्फ युद्ध नहीं, भाईचारे और संस्कृति का प्रतीक
देवीधुरा की बग्वाल को केवल एक पारंपरिक युद्ध के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह उत्तराखंड की लोक आस्था, सामुदायिक सहभागिता और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा आयोजन है।
बग्वाल में अलग-अलग खामों की भागीदारी, पारंपरिक वेशभूषा, ढाल, शंखनाद और मां वाराही के जयकारे इस आयोजन को विशिष्ट बनाते हैं। बग्वाल के बाद प्रतिभागियों का एक-दूसरे से गले मिलना यह संदेश देता है कि परंपरा के भीतर भी भाईचारे और सामाजिक एकता की भावना सबसे महत्वपूर्ण है।
मुख्यमंत्री ने भी कहा कि देवीधुरा की यह परंपरा उत्तराखंड की ऐसी अनूठी विरासत है, जिसे देश-दुनिया में पहचान मिली हुई है। इसके संरक्षण और विकास के लिए सरकार आधुनिक सुविधाओं के साथ पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखने पर काम कर रही है।
बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालु और जनप्रतिनिधि
ऐतिहासिक बग्वाल मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालु, स्थानीय लोग, जनप्रतिनिधि और गणमान्य लोग मौजूद रहे। कार्यक्रम में कैबिनेट मंत्री राम सिंह कैड़ा, केंद्रीय राज्यमंत्री एवं सांसद अजय टम्टा, जिला पंचायत अध्यक्ष आनंद सिंह अधिकारी, मां वाराही मंदिर समिति अध्यक्ष हीराबल्लभ जोशी सहित कई जनप्रतिनिधि और अधिकारी मौजूद रहे।
इसके अलावा जिलाधिकारी मनीष कुमार, पुलिस अधीक्षक रेखा यादव, मुख्य विकास अधिकारी जीएस खाती, परियोजना निदेशक अजय सिंह, सीएमओ देवेश चौहान सहित बड़ी संख्या में अधिकारी और स्थानीय गणमान्य लोग कार्यक्रम में शामिल हुए।
देवीधुरा की धरती पर इस वर्ष भी बग्वाल ने एक बार फिर यह साबित किया कि उत्तराखंड की लोक परंपराएं आज भी लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने की ताकत रखती हैं। मां वाराही के जयकारों के बीच फल-फूलों से खेली गई आठ मिनट की बग्वाल ने श्रद्धालुओं के लिए आस्था और रोमांच से भरा यादगार दृश्य प्रस्तुत किया।
