‘दूधगाड़ू फूलोई थौलू’ मेला
उत्तरकाशी। गंगा घाटी के पर्वतीय इलाकों में परंपराएं आज भी उसी जीवंतता के साथ लोगों के जीवन का हिस्सा हैं। इसी कड़ी में उत्तरकाशी जनपद के बाड़ागड्डी क्षेत्र में आयोजित हुआ ‘दूधगाड़ू फूलोई थौलू मेला’, जो आस्था, लोकसंस्कृति और सामूहिकता का अनूठा संगम माना जाता है।

यह मेला सदियों से यहां की परंपरा और लोकविश्वास का प्रतीक रहा है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इस मेले का आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकजुटता और सांस्कृतिक धरोहर को भी जीवित रखता है।
उत्साह और श्रद्धा का माहौल

मेले में दूर-दूर से लोग पहुंचे और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना की। क्षेत्र की लोक कलाओं, लोकगीतों और नृत्य प्रस्तुतियों ने आयोजन को और भी जीवंत बना दिया। ग्रामीणों का कहना है कि इस मेले का इंतजार उन्हें पूरे साल रहता है, क्योंकि यह सिर्फ एक धार्मिक आयोजन ही नहीं बल्कि आपसी मेल-मिलाप और सामाजिक रिश्तों को मजबूत करने का भी अवसर होता है।
सांस्कृतिक धरोहर को संजोए रखने का प्रयास
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, “दूधगाड़ू फूलोई थौलू” मेला प्रकृति, देवभूमि की परंपरा और मानव–समाज के अटूट रिश्ते का प्रतीक है। इस अवसर पर लोग एकजुट होकर सांस्कृतिक धरोहर को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प भी लेते हैं।
मुख्यमंत्री व प्रशासन की सराहना
स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने मेले के सफल आयोजन के लिए ग्रामीणों को बधाई दी और कहा कि इस तरह के आयोजन उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को और अधिक मजबूती प्रदान करते हैं।
यह मेला न सिर्फ धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन है, बल्कि यह बताता है कि उत्तराखंड की असली ताकत उसकी लोकपरंपरा और सामूहिकता की भावना है।
