फसलों के दाम को तरस रहे किसान
मुक्तेश्वर। उत्तराखंड में किसान अपनी फसलों के उचित दाम न मिलने से परेशान हैं, जबकि सरकार और प्रशासन का ध्यान पंचायत चुनावों पर केंद्रित है। रामगढ़ क्षेत्र के किसानों के लिए, यह स्थिति एक दोधारी तलवार की तरह है।

एक तरफ, राजनीतिक समीकरण हैं। पंचायत चुनाव सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक रणभूमि है। मुख्यमंत्री और पूरा प्रशासन इन चुनावों को जीतने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा रहे हैं, क्योंकि ये चुनाव उनकी लोकप्रियता और शासन की दिशा तय करते हैं। इस वजह से, किसानों की समस्याओं को तत्काल प्राथमिकता नहीं मिल पा रही है।
दूसरी तरफ, किसानों का दर्द है। रामगढ़ के किसान मेहनत से फसल उगाते हैं, लेकिन जब उसे बेचने की बात आती है, तो उन्हें उसकी लागत भी नहीं मिल पाती। बिचौलियों का बोलबाला है, और सरकारी खरीद केंद्र या तो पर्याप्त नहीं हैं या उनकी प्रक्रिया बहुत जटिल है। मंडियों में भी सही दाम नहीं मिल पाता। इस वजह से, किसान कर्ज के जाल में फंस रहे हैं और खेती छोड़ रहे हैं।


न्याय का तराजू: किसानों का हित सर्वोपरि होना चाहिए या नहीं?
एक निष्पक्ष रिपोर्ट के रूप में, यह साफ है कि सत्ता में बैठे लोगों के लिए राजनीतिक समीकरणों को साधना महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन जनता, खासकर किसानों का हित, सबसे ऊपर होना चाहिए। अगर किसान ही खुशहाल नहीं होगा, तो राज्य और देश कैसे आगे बढ़ेगा?

रामगढ़ के किसानों की मांगें जायज हैं और उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार को चाहिए कि वह न सिर्फ पंचायत चुनाव पर ध्यान दे, बल्कि किसानों के लिए निम्नलिखित कदम भी उठाए-
* फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) सुनिश्चित करे और खरीद केंद्रों की संख्या बढ़ाए।
* बिचौलियों की भूमिका खत्म करने के लिए सीधे किसानों से खरीद की व्यवस्था बनाए।
* किसानों को आधुनिक तकनीक और खेती के तरीकों का प्रशिक्षण दे ताकि उनकी पैदावार और आय दोनों बढ़े।
* सहकारी समितियों को मजबूत करे ताकि किसान मिलकर अपनी उपज बेच सकें और बेहतर दाम पा सकें।
जब तक सरकार किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं करती, तब तक पंचायत चुनावों में जीत का कोई खास मतलब नहीं होगा। एक सच्चा नेता वही है जो अपने लोगों का ध्यान रखता है, न कि केवल अपनी कुर्सी का।
अपेक्षा और उम्मीद
समस्त किसान
रामगढ़ , धारी ,भीमताल,
आगर और क्रोशिया कुटोली के तमाम किसान।
(जितेन्द्र रैकवाल की रिपोर्ट)
