उत्तराखण्ड का लोकपर्व
देहरादून। उत्तराखण्ड की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा में सावन-भादो के महीने का एक विशेष पर्व है घी संक्रांति, जिसे स्थानीय बोली में घ्यूत्यार या ओलगिया भी कहा जाता है। यह पर्व भाद्रपद संक्रांति को मनाया जाता है और खास तौर पर कुमाऊं मंडल में इसका बड़ा महत्व है।

किसानों और पशुपालकों का पर्व
घी संक्रांति का सीधा संबंध खेती-बाड़ी और पशुपालन से है। मानसून के दौरान खेतों में मेहनत और पशुओं की देखभाल करने के बाद जब हरियाली चारों ओर छा जाती है, तब इस पर्व को समृद्धि और आभार के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।

इस दिन घरों में ताज़े घी, चपाती और बड़े प्यार से बनाए गए उड़द के पकोड़े (बड़े) विशेष रूप से परोसे जाते हैं। पारंपरिक रूप से परिवार के छोटे-बड़े सभी लोग सुबह-सुबह ताजे बने घी के साथ रोटी खाते हैं।
रिश्तों को जोड़ने वाला त्योहार
लोकपर्व ओलगिया का भी इस दिन विशेष महत्व है। इस अवसर पर भांजे अपने मामा को, दामाद अपने ससुराल को, और शिष्य अपने गुरु को तोहफे देते हैं। इसे रिश्तों को मजबूत बनाने और सामाजिक सौहार्द बढ़ाने का प्रतीक माना जाता है। वहीं, पशुपालक और लोहार-कारीगर भी अपने-अपने काम से जुड़ी वस्तुएं उपहार में देकर आभार जताते हैं।
लोकगीत और परंपराएं
गांवों में महिलाएं इस दिन पारंपरिक गीत गाती हैं और बच्चे खेल-खेल में “ओलगिया” मांगने घर-घर जाते हैं। घरों में बनी ताजे दूध से घी, दही और मक्खन की खुशबू पूरे वातावरण को जीवंत कर देती है।
सांस्कृतिक और सामाजिक संदेश
घी संक्रांति केवल भोजन या उत्सव का पर्व नहीं, बल्कि यह हमारी संस्कृति में परिश्रम, आभार और साझेदारी का संदेश देता है। यह पर्व पीढ़ियों से उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति का हिस्सा रहा है और आज भी लोग इसे उत्साह और उमंग के साथ मनाते हैं।
कुल मिलाकर, घी संक्रांति उत्तराखण्ड के पर्व-त्योहारों में सिर्फ परंपरा ही नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि और रिश्तों का अद्भुत संगम है।
