उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में पॉलीहाउस, कीवी उत्पादन और जैविक खेती से किसान आत्मनिर्भर बन रहे हैं।
बागेश्वर। उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में वर्षों से पलायन एक गंभीर समस्या रहा है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सीमित संसाधनों के कारण हजारों लोग गांव छोड़कर शहरों की ओर जाते रहे हैं। लेकिन अब बागेश्वर जिले से एक नई और सकारात्मक तस्वीर सामने आ रही है। यहां “रिवर्स माइग्रेशन” यानी शहरों से वापस गांव लौटने की प्रक्रिया तेज हुई है।

अब युवा गांवों में रहकर आधुनिक खेती, उद्यान, पशुपालन, मत्स्य पालन और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में रोजगार के अवसर तैयार कर रहे हैं। इससे न केवल परिवारों की आय बढ़ रही है, बल्कि गांवों में नई ऊर्जा भी लौट रही है।
प्रशासन की पहल से बदली तस्वीर

बागेश्वर जिले में जिलाधिकारी आकांक्षा कोंडे के नेतृत्व में कृषि आधारित योजनाओं को जमीनी स्तर तक पहुंचाने का काम तेजी से किया गया है। किसानों को विभागीय योजनाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और तकनीकी सहायता से जोड़ा गया है।
कृषि, उद्यान और मत्स्य विभाग के संयुक्त प्रयासों से किसानों को 80 से 90 प्रतिशत तक अनुदान पर पॉलीहाउस, आधुनिक कृषि उपकरण, बीज, सिंचाई सुविधाएं और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा रहा है।
इसी का परिणाम है कि कई किसान अब पारंपरिक खेती छोड़कर आधुनिक और व्यावसायिक खेती की ओर बढ़ रहे हैं।
मनोज कोरंगा बने युवाओं के रोल मॉडल
सलीगांव के युवा किसान मनोज कोरंगा ने आधुनिक खेती की मिसाल पेश की है। उन्होंने एकीकृत कृषि प्रणाली अपनाई है, जिसमें पॉलीहाउस, मत्स्य पालन और खाद्य प्रसंस्करण को साथ जोड़ा गया है।
वर्तमान में उनके पास 3 पॉलीहाउस, 3 मत्स्य तालाब और एक फूड प्रोसेसिंग यूनिट है। इससे वे हर साल लगभग 3 से 4 लाख रुपये की आय अर्जित कर रहे हैं।
सबसे खास बात यह है कि उन्होंने 4 से 5 स्थानीय लोगों को रोजगार भी दिया है। इससे गांव के अन्य युवाओं को भी प्रेरणा मिल रही है।
जैविक और औषधीय खेती से लाखों की कमाई
गरुड़ ब्लॉक के किसान चंद्रशेखर पांडे ने लगभग 2 हेक्टेयर भूमि पर जैविक और औषधीय खेती शुरू की है। वे तुलसी, लेमनग्रास, अश्वगंधा और रोजमेरी जैसे उत्पाद उगा रहे हैं।
उन्होंने अपने उत्पादों को ‘हिम नेचुरल’ ब्रांड नाम से बाजार में उतारा है। ब्रांडिंग और बेहतर मार्केटिंग की वजह से उन्हें हर साल 7 से 8 लाख रुपये की आय हो रही है।
यह उदाहरण बताता है कि अगर किसान सही फसल, सही तकनीक और सही बाजार से जुड़ें तो पहाड़ों में भी शानदार कमाई संभव है।
आधुनिक तकनीक से बढ़ा उत्पादन, घटी लागत
किसान दान सिंह ने आत्मा योजना और आरकेवीवाई के तहत प्रशिक्षण लेकर खेती में बदलाव किया। उन्होंने वर्मी कंपोस्ट, लाइन बुवाई, आधुनिक कृषि यंत्रों और वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाया।
इसका नतीजा यह हुआ कि उत्पादन में 30 से 40 प्रतिशत तक वृद्धि हुई, जबकि खेती की लागत में भी उल्लेखनीय कमी आई।
यह मॉडल अब अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है।
महिला शक्ति भी बनी बदलाव की ताकत
बागेश्वर में महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिल रहा है। मन्यूड़ा गांव की हंसी शाह ने 38 नाली भूमि पर वैज्ञानिक खेती शुरू की।
उन्होंने मोटे अनाज, सब्जियां और अन्य फसलों का उत्पादन कर अपनी वार्षिक आय 4 से 5 लाख रुपये तक पहुंचा दी।
कृषि विभाग ने उन्हें 80 प्रतिशत अनुदान पर कृषि उपकरण उपलब्ध कराए। आज वे 40 से अधिक महिलाओं को प्रशिक्षण देकर स्वरोजगार से जोड़ रही हैं।
इससे महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत होने के साथ गांवों में आत्मनिर्भरता का माहौल बन रहा है।
बागेश्वर में तेजी से बढ़ रहा कीवी उत्पादन
बागेश्वर जिले में कीवी खेती अब नई आर्थिक क्रांति बनकर उभर रही है। वर्ष 2022-23 से पहले जिले में कीवी का क्षेत्रफल केवल 5 से 8 हेक्टेयर था।
अब यह बढ़कर करीब 80 हेक्टेयर तक पहुंच गया है। वर्तमान में 15 हेक्टेयर क्षेत्र में फल उत्पादन हो रहा है।
उत्पादन पहले 100 से 110 क्विंटल था, जो अब बढ़कर 1100 क्विंटल से ज्यादा हो गया है।
किसानों की संख्या 40-50 से बढ़कर 350 से अधिक हो चुकी है। इस क्षेत्र से कुल आय 13-14 लाख रुपये से बढ़कर 1.5 से 1.7 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है।
जड़ी-बूटी खेती से महिलाओं को नया सहारा
बागेश्वर में ‘कुटकी’ जैसी औषधीय जड़ी-बूटी की खेती भी तेजी से बढ़ रही है। करीब 46 हेक्टेयर क्षेत्र में 350 महिलाएं इसकी खेती कर रही हैं।
इससे लगभग 70 लाख रुपये की आय अर्जित हुई है। इससे महिलाओं को घर के पास रोजगार मिला है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है।
बागेश्वर बना पहाड़ के विकास का मॉडल
बागेश्वर जिले की यह सफलता बताती है कि यदि योजनाएं सही तरीके से जमीन पर लागू हों, किसानों को तकनीक और बाजार मिले, तो पहाड़ों से पलायन रोका जा सकता है।
आज बागेश्वर सिर्फ खेती नहीं कर रहा, बल्कि उत्तराखंड के दूसरे पर्वतीय जिलों के लिए विकास का मॉडल बनकर सामने आ रहा है।
यह बदलाव उम्मीद देता है कि आने वाले समय में पहाड़ खाली नहीं होंगे, बल्कि रोजगार और समृद्धि के नए केंद्र बनेंगे।
