उत्तराखंड में आपदा संवेदनशीलता और विकास परियोजनाओं के बीच संतुलन की आवश्यकता
मुक्तेश्वर। देवभूमि उत्तराखण्ड न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, बल्कि अपनी अत्यधिक भूगर्भीय और पर्यावरणीय संवेदनशीलता के लिए भी प्रसिद्ध है। यह एक कठोर सच्चाई है कि उत्तराखण्ड एक आपदा का राज्य है, जहां भूस्खलन, बाढ़, बादल फटना और भूकंप का खतरा हमेशा मंडराता रहता है। हाल के वर्षों में जोशीमठ जैसे शहरों का धँसना और हर मानसून में होने वाली तबाही इस बात का प्रमाण है कि विकास की वर्तमान नीतियाँ और निर्माण योजनाएँ हिमालयी पारिस्थितिकी के साथ सामंजस्य बिठाने में विफल रही हैं।

यह लेख केवल दोषारोपण के लिए नहीं है, बल्कि एक जागरूक संवाद शुरू करने और सही दिशा में सामुदायिक प्रयास को प्रेरित करने के लिए है।
1. स्थानीय समस्याएं: विकास और विनाश की दुविधा

उत्तराखण्ड में कई स्थानीय समस्याएँ सीधे तौर पर अविवेकपूर्ण निर्माण और नीतियों से जुड़ी हुई हैं:
अवैज्ञानिक निर्माण: “ऑल वेदर रोड” (चारधाम परियोजना) और अन्य बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं के तहत पहाड़ों को अवैज्ञानिक तरीके से काटना और बिना उचित ड्रेनेज (जल निकासी) के सड़कें बनाना, भूस्खलन की घटनाओं को कई गुना बढ़ा रहा है।
स्थानीय प्रभाव: अक्सर, इन परियोजनाओं के कारण पहाड़ी ढलानों पर बसे गांवों के नीचे की ज़मीन खिसकने लगती है, जिससे घर और खेती की ज़मीन तबाह हो जाती है।
जल निकासी का अभाव: पर्वतीय क्षेत्रों में पानी के प्राकृतिक रास्तों पर अतिक्रमण या उन्हें बाधित करना सबसे बड़ी आपदाओं का कारण बनता है। मानसून में पानी को सही निकासी न मिलने पर वह ज़मीन के अंदर रिसता है, जिससे मिट्टी भुरभुरी होती है और भूस्खलन होता है।
असंतुलित पर्यटन मॉडल: कुछ गिने-चुने स्थानों (जैसे चारधाम और कुछ प्रमुख हिल स्टेशन) पर अत्यधिक और अनियंत्रित पर्यटन को बढ़ावा दिया गया है। इससे इन क्षेत्रों में आधारभूत संरचना पर दबाव बढ़ा है और अनियोजित, बहुमंजिला इमारतों का निर्माण हुआ है जो भूकंप या भूस्खलन की दृष्टि से अत्यंत असुरक्षित हैं।
पलायन की समस्या: दूसरी ओर, राज्य के ग्रामीण और सीमावर्ती क्षेत्र, जहाँ पर्यावरण के अनुकूल विकास किया जा सकता था, बुनियादी सुविधाओं के अभाव में खाली हो रहे हैं, जिससे पलायन बढ़ रहा है।
खनन और नदी दोहन: नदियों के किनारों पर अवैज्ञानिक खनन नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट करता है और बाढ़ के समय नदी के कटाव की क्षमता को बढ़ा देता है।
2. नीतियों का पुनर्मूल्यांकन: कहाँ चूक हुई?
सरकार ने आपदा प्रबंधन के लिए नीतियां (जैसे SDRF का प्रावधान, अर्ली वार्निंग सिस्टम) बनाई हैं, लेकिन समस्या उनके क्रियान्वयन की दिशा और विकास के मूल मॉडल में है:
पारदर्शिता और जनभागीदारी का अभाव: बड़ी निर्माण परियोजनाओं (सड़क, सुरंग, बाँध) के पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (EIA) की प्रक्रिया अक्सर कठोर, पारदर्शी और जन-केंद्रित नहीं होती। स्थानीय समुदाय, जिनके पास अपने क्षेत्र की संवेदनशीलता का पारंपरिक ज्ञान होता है, उनकी राय को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता।
नियमों की अनदेखी: आपदा संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण पर प्रतिबंध या विशेष निर्माण मानकों के नियम अक्सर कागज़ों तक सीमित रह जाते हैं। अवैध और असुरक्षित निर्माण को रोकने के लिए ज़मीनी स्तर पर कठोर और निरंतर निगरानी का अभाव है।
दीर्घकालिक सोच का अभाव: वर्तमान नीतियाँ अक्सर आपदा आने के बाद राहत और बचाव पर अधिक केंद्रित होती हैं, न कि आपदा आने से पहले जोखिम को कम करने और सुरक्षित, स्थायी विकास मॉडल अपनाने पर।
3. आगे की राह: सकारात्मक मार्गदर्शन और सामुदायिक शक्ति
हमें यह समझना होगा कि सरकार को जगाना और नीतियों को बदलना हम सब की सामूहिक ज़िम्मेदारी है। हमें विनाश नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व वाले विकास मॉडल की ओर बढ़ना होगा:
उत्तराखण्ड-सम्मत विकास: हमें एक ऐसे विकास मॉडल की आवश्यकता है जो पहाड़ी भूगोल और समाज के अनुरूप हो। छोटे, विकेन्द्रीकृत और पर्यावरण-अनुकूल उद्योगों (जैसे- जैविक कृषि, स्थानीय हस्तकला, होम-स्टे आधारित इको-टूरिज्म) को बढ़ावा दिया जाए।
पारंपरिक ज्ञान का सम्मान: स्थानीय लोगों और समुदायों के पास पीढ़ी-दर-पीढ़ी का पारंपरिक पारिस्थितिकीय ज्ञान होता है। बड़े निर्माण और विकास की योजनाओं में स्थानीय पंचायतों और समुदायों की राय को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
नियमों के लिए ज़ोर: हर जागरूक नागरिक को यह सुनिश्चित करने के लिए आवाज़ उठानी चाहिए कि आपदा-संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण के नियमों का सख्ती से पालन हो। हमें अवैध खनन और अनियंत्रित निर्माण की सूचना संबंधित अधिकारियों तक पहुँचानी होगी।
आपदा-सखी और मित्र योजना को सशक्त करें: सरकार की ‘आपदा मित्र’ और ‘आपदा सखी’ जैसी पहलों का हिस्सा बनें। हर गांव में स्थानीय स्वयंसेवकों को प्राथमिक चिकित्सा और आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण मिलना चाहिए, ताकि वे बचाव कार्य के पहले 72 घंटों में आत्मनिर्भर बन सकें।
जल-जनित जागरूकता: अपने आस-पास के जल स्रोतों, गदेरों (पहाड़ी नाले) और ड्रेनेज सिस्टम को स्वच्छ और अबाधित रखने के लिए स्थानीय स्तर पर अभियान चलाएं। पानी का सही प्रबंधन ही भूस्खलन को रोकने का पहला कदम है।
निष्कर्ष:
उत्तराखण्ड का भविष्य न तो सरकार की नीतियों पर अकेला निर्भर है और न ही केवल प्रकृति के भरोसे है। यह हमारे सामूहिक विवेक, स्थानीय सक्रियता और प्रकृति के प्रति सम्मान पर निर्भर करता है। हमें विनाशकारी, त्वरित लाभ वाले ‘विकास’ की ललक को त्यागकर सतत, सुरक्षित और उत्तराखंड-सम्मत विकास की मांग करनी होगी।
यह समय है कि हम सब मिलकर यह आवाज़ उठाएं: “हिमालय केवल एक पहाड़ नहीं, यह हमारा जीवन है। इसे बचाना, हम सबका कर्तव्य है।”
आप अपनी आवाज़ उठाएं! अपने स्थानीय विधायक/सांसद को पत्र लिखें। अपने गांव में निर्माण पर नज़र रखें। अपनी अगली यात्रा में इको-टूरिज्म को प्राथमिकता दें। जागो, और जोड़ो!
जितेन्द्र रैकवाल
ग्राम – दारिमा सीमायल रामगढ़।
